सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

मैं कोई भी काम व्यवस्थित तरीके से नहीं करता था और न ही मेरे पास किसी काम को सही तरीके से करने का तरीका होता था

                    ° Note No. 54 °          


      
         मैं अक्सर लोगों को काम करते हुए देखता था...कितने ही लोग और काम भी कितने ही! शायद अधिकतर लोग अपने काम से बेहद प्यार करते थे...वे अपने काम में पूरे मन से लगे रहते थे, कुछ लोग तो अपने काम में इतने busy हो जाते थे कि बाहरी दुनिया में क्या चल रहा है, उन्हें इसकी खबर तक नहीं होती थी...I think शायद लोगों में अपने काम के प्रति ऐसी ही दिल्लगी होनी चाहिए।
       मैंने देखा था, लोगों का काम करने का अपना एक तरीका और Perfection होता था,लोग अपने काम के प्रति वफ़ादार और अधिक सजग रहते थे...पर मैं नहीं था! मैं इस मामले में थोड़ा लापरवाह क़िस्म का था...मैं किसी भी काम को Managed Process में नहीं कर पाता था, उसे करने का मेरा अपना एक तरीका होता था...शायद मैं और लोगों के जितना Active और Perfect नहीं था। हर काम करने के मामले में,मैं हमेशा से Lazy type का लड़का रहा था।...बचपन में भी मैं ज्यादा काम और मेहनत करने से बचता था और हर काम को पूरा करने का कोई आसान-सा तरीका ढूंढ लेता था।
        वैसे...जैसे मेरी पढ़ाई में काफी दिलचस्पी थी और मुझे पढ़ना तो पसंद था, पर अत्यधिक पढ़ना अच्छा नहीं लगता था। School Time में, मैं अपना fairwork और homework ज्यादातर classroom में ही कर लिया करता था,और उस बचे समय में मस्ती,बातें, खेलकूद और TV देखना बहुत हो जाता था...घर आके मैंने कभी अधिक पढ़ाई नहीं की मैं अपनी पढ़ाई का एक बड़ा हिस्सा School में ही खत्म कर लिया करता था।
        इसी तरह मुझे ठीक से और ज्यादा देर तक अपने कपड़े धोते रहना भी बेमतलब लगता था और कपड़ों पर इस्त्री करना तो मुझे जरा भी पसंद नहीं था,मैं without iron किये कपड़े ही पहनता था। हालाँकि मैं साफ-सफाई पर काफी ध्यान देने वाला इंसान था,लेकिन मुझे अपने Room को बार-बार साफ करना और उसे व्यवस्थित करना भी व्यर्थ लगता था। मुझे लगता था कि अपने कमरे को बार-बार यथाक्रम प्रबंधित करते रहना समय की बर्बादी हैं...मेरा Personal Room कभी व्यवस्थित और सजावटी नहीं रहा, मेरे कमरे में सामान हमेशा तितर-बितर ही रहता था,मेरी किताबें और दूसरा सामान भी इधर-उधर बिखरा पड़ा रहता था,इस तरह मेरा Room हमेशा से अस्त-व्यस्त रहता था...हालांकि इससे क्या फर्क पड़ता हैं!!
         However my personality and prototype are something else...
        
                         
                        ©SD. Arya

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

एक शिक्षक, जिसने जीवन पढ़ाया !

                                                Note No. '42'                                अपने गाँव से कक्षा पाँचवीं (जिला बोर्ड) की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद मेरा चयन संभाग स्तरीय शासकीय प्रतिभावान आवासीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, उज्जैन में हुआ। यह चयन मेरे जीवन का पहला बड़ा मोड़ था—एक ऐसा मोड़, जहाँ उत्साह से अधिक अनजानी आशंकाएँ मेरा इंतज़ार कर रही थीं। जब मैं पहली बार उस विद्यालय परिसर में पहुँचा, तो सबकुछ अपरिचित और कुछ हद तक वियोजित-सा लगा। नया स्कूल, नए शिक्षक, नए चेहरे और एक बिल्कुल अलग वातावरण—मानो मैं अपने परिचित संसार से अचानक बहुत दूर आ गया हूँ। मुझे वहाँ छोड़ने मेरे बड़े भाई आए थे। जब तक वे मेरे साथ रहे, तब तक मैं स्वयं को संभाले रहा; लेकिन जैसे ही वे लौटे, मेरे भीतर का साहस जैसे उनके साथ ही चला गया। उस रात मैं सो नहीं पाया। मैंने तकिए को अपने चेहरे से सटा लिया और चुपच...

🪷स्मृतियों में जीवित एक गुरू🪷

                                     “Note No. 111”             डॉ. खत्री सर का मैं अत्यंत प्रिय शिष्य था। चूंकि मैंने अपनी स्कूली पढ़ाई को अस्त-व्यस्त कर लिया था, इस कारण एक बार उन्होंने आक्रोश में मुझे कठोर दंड दिया। उससे पूर्व उन्होंने किसी भी कारण मुझे कभी नहीं पीटा था—क्योंकि मैंने कभी उन्हें वैसा अवसर ही नहीं दिया था। पर वह प्रहार क्रोध का नहीं, असीम स्नेह का परिणाम था। वह दंड एक ऐसे गुरु का उत्तरदायित्व था, जो अपने प्रिय शिष्य को पतन की ओर जाते देखकर मौन नहीं रह सकता। वह दंड साधारण नहीं था—वह शिष्य के लिए संजीवनी बूटी था, जीवनदायी, चेतना जगाने वाला। डॉ. जी.डी. खत्री जैसे शिक्षक सदियों में विरले ही जन्म लेते हैं। ऐसे व्यक्तित्व किसी कालखंड की संपत्ति नहीं होते, वे युग की चेतना बन जाते हैं—इसीलिए उन्हें हम सदी के महानायक कहते हैं। उनका व्यक्तित्व असाधारण था, गरिमा और करुणा का अद्भुत संगम। वे लाजवाब थे। और यह मेरा ही दुर्भाग्य रहा कि मैं उनके उत्तम व्यक्तित्व ...

मोहब्बत में कभी विकल्प नहीं होता

                     Note No. “108”                          यह एक गहरी और भावनात्मक भावना से भरी हुई विचारधारा का वर्णन हैं...सच्ची मोहब्बत में कभी विकल्प नहीं होता, और अगर विकल्प हुआ, तो फिर वो मोहब्बत ही नहीं हैं, छलावा हैं...फिर चाहे वे जिंदगी भर मिले या ना मिले, इस बात से क्या फ़र्क पड़ता हैं !...वास्तव में उसी एक की खातिर बेलाग खुशियों का त्याग करके ताउम्र उसके इंतजार में जिंदगी तमाम ख़ाक कर ली जाती हैं...पर अन्यथा नहीं हुआ जाता !...जिसे हम बेतहाशा चाहते हैं वो अंशगत हो जाता हैं, हममें समाहित हो जाता हैं ! अंततः उसके ना लौटने अथवा उसको फिर कभी ना पाने की नाउम्मीदी में भी किसी और का नहीं हुआ जा सकता, तथापि जिंदगी तन्हाई में बिताकर ताउम्र प्यार की वफ़ा और शुचिता को अखण्ड रखा जाता हैं।                                             प्रेम अपने प्रियतम के प्...