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मेरी आध्यात्मिक प्रवृत्ति

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          I Think...और सिर्फ मेरे सोचने से ही नहीं, अन्य प्रमाणों से भी ये तर्कसंगत सिद्ध होता हैं कि सनातन वैदिक धर्म ही ईश्वरीय और सत्यज्ञान तथा मूलधर्म हैं...इस बात में कोई संदेह नहीं..!..और जो हमें History में वैदिक काल वगैरह पढ़ाया जाता हैं वो सब झूठ हैं...वेदज्ञान का काल सृष्टि के साथ ही प्रारंभ होता है तथा जब सृष्टि प्रलय की प्रगाढ़ निद्रा में निमग्न रहती हैं,तब भी यह यथार्थ-वास्तविक ज्ञान मौजूद होता हैं।...सत्यज्ञान का कभी ह्वास नहीं होता!...बाकी दुनिया में प्रचलित सभी धर्म, मत-पंथ, सम्प्रदाय,जाति, रीति-रिवाज व विभिन्न संस्कृति इत्यादि जो वेद सम्मत नहीं हैं वे सब अनर्थ ज्ञान से निर्मित हुए है, जिनका अस्तित्व एकदम खोखला होता हैं एवं सत्य और वास्तविकता की पराकाष्ठा से उनका कोई नाता नहीं होता हैं।...और भी बहुत-सी बातें होती हैं, जो इस संबंध में फिलहाल लिखते वक्त मेरे अंदर चल रही हैं, अगर लिखने बैठा तो यकीन मानो सुबह से शाम हो जाएगी पर मेरा लिखना पूरा नहीं होगा...शायद आप इतने में ही समझ पाए...!
     मुझे पता हैं, वैदिक संस्कृति को समझना एवं अपनाना बेहद मुश्किल हैं। हमारे देश भारत में अभी जो हिन्दू धर्म विद्यमान हैं वो अति प्राचीन समय में कभी वैदिक धर्म ही था...धीरे-धीरे धर्म के ठेकेदारों और पाखण्डियों ने इसका स्वरूप पूर्णतया बदल दिया जोकि आज हमें अंधविश्वास और आडंबरों से युक्त दिखलाई पड़ता हैं। वैदिक मार्ग पर चलना अत्यंत कठिन होता हैं अतः दुष्ट प्रवृत्तियों वाले लोगों ने इसे सरल मिथ्या रूप में परिवर्तित कर दिया...वेदों का सत्य और मूल प्राकृतिक ज्ञान हम से छुपा लिया गया...!
        प्राचीन समय में इस ज्ञान का प्रचार-प्रसार करने वाले कुछ ऋषि-महर्षियों में महर्षि व्यास,गौतम,कपिल,पतंजलि,कात्यायन,वात्स्यायन, कणाद,याज्ञवल्क्य,पाणिनि,जैमिनि इत्यादि और भी कईं ऋषि-महर्षि थे तथा आधुनिक काल में जब अन्य विश्व के साथ ही भारत वर्ष भी इस पवित्र ज्ञान को भूलने लगा था वो भूमि जिसपर आदि सृष्टि की रचना हुई थी ऐसे आर्यावर्त पर वैदिक ज्ञान का ह्वास होने लगा था...और तभी ऐसे कठिन समय में इस परम्परा को पुनर्जीवित तथा इसका सुचारू निर्वाहन का अखण्ड प्रयास और उन्नत कार्य "महर्षि दयानंद" सरस्वती ने 10 अप्रैल सन् 1875 को आर्य समाज की स्थापना करके किया था।...और मूल वैदिक परम्परा की फ़ेहरिस्त में वो अंतिम महर्षि थे...अंततः यहाँ एक बात और ध्यान देने योग्य होगी कि उनके पश्चात इस अत्यंत दोषपूर्ण युग में दूसरा कोई वास्तविक-शुद्धात्मा व्यक्ति पैदा नहीं हो सकता...ऐसा कोई नहीं हो सकता, जो पूर्णतया विशुद्ध और निष्कलंक हो क्योंकि अब प्रकृति में वो वातावरण ही नहीं बचा जिसमें एक महर्षि का व्यक्तित्व अथवा चरित्र जिया जा सके।
     वेद अपौरुषेय हैं(अर्थात् जिनकी रचना कोई स्त्री या पुरुष नहीं कर सकता),यानि वेद ईश्वरकृत हैं। चूंकि वेद ईश्वरकृत हैं,तो जाहिर-सी बात हैं वेदों का अवतरित हुए सृष्टि के समय के समान ही वर्तमान समय सन् 2020 में 1,96,08,53,121 वर्ष हो चुके हैं।
        इस समय लोगों की हमेशा से ये गलतफहमी रही है कि वो आर्यसमाज को बाकी मत-पंथों की तरह ही अलग से विनिर्मित हुआ मानते हैं, जबकि यह तो बिल्कुल मिथ्या बात हैं...आर्यसमाज पूर्णतः वैदिक सभ्यता पर आधारित हैं। आर्य का मतलब सत्य और श्रेष्ठ होता हैं और प्राचीन समय में श्रेष्ठ लोगों को आर्य व आर्यपुत्र कहकर बुलाया जाता था।सर्वप्रथम मानव-सृष्टि की शुरुआत आर्यावर्त अर्थात् भारतभूमि से हुई थी,तब कोई देश नहीं था,समय बीतने के साथ लोग इधर-उधर होने लगे,नए देश बने और कालांतर में लोगों द्वारा अपने-अपने अन्यर्थ,अनर्थ ज्ञान,विचार,अनुभव तथा स्वविवेक से अलग-अलग धर्म-संस्कृति व मत-मतान्तर आदि बना लिए गए और आजतलक उसी को सत्य मानकर उसकी राह पर चलने लगे।
        ...और अंततः आख़िरकार एक बात कहना चाहूंगा कि चाहे जो हो, एक बार सच्चे दिल से और पूरी ईमानदारी के साथ...वास्तविक वैदिक ग्रंथों, पुस्तकों,लेखों व विचारों का अध्ययन-विश्लेषण करके देखो...वास्तव में तुम्हें महसूस होगा कि यथार्थता, वास्तविकता तथा सत्यता का बोध वैदिक ज्ञानमें ही निहित हैं।
        ...सचमुच तुम ये महसूस करोगे कि तुम उस अनादि-अनंत-सर्वशक्तिमान परमपिता-परमेश्वर के निकट जा रहे हो तुम्हें ये भी अहसास होगा कि तुम एक साफ और सच्चे-दिल इंसान बनते जा रहे हों!!

             🔅ओ३म्🔅  
                
              
                     ©Sudarshan Arya  

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